बिहार का एक ऐसा गांव जहाँ के लोगों से विवाह नहीं करना चाहते है, जिसे कुवारों का गांव कहा जाता है?
बिहार के कैमूर जिले के अधौरा ब्लॉक में यह एक पहाड़ी गांव जिसका नाम बरवान कलां {Barwan Kakan} है वहां के लोगों का विवाह नहीं हो पता है। इसलिए इस गांव को भारत के सबसे अनोखे और चर्चित कुवारों का गांव {Village of Bechelors} के नाम से जाना जाता है। कैमूर के पहाड़ियों पर काफी ऊंचाई और घने जंगलों के बीच बसा के सुदूर ग्रामीण इलाका है जिसकी दुरी पटना से 300 किमी है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ लगभग 244 परिवार रहते है और कुल आबादी 1387 के लगभग है, जिसमे पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक है। यहाँ मुख्य रूप से खरवार जनजाति के लोग रहते है।
इससे ”कुवारों का गांव” {The Bachelor’s Village} कहने के पीछे की कहानी दिलचस्प है। आइये जानते है – इस गांव की सबसे हैरान करने वाली बात यह है की साल 1967 से लेकर 2017 तक { लगभग 50 सालों तक } इस गांव में एक भी बारात नहीं आयी थी। और न ही किसी लड़के की शादी हुई थी। एक समय यहाँ 130 से अधिक ऐसे पुरुष थे जो शादी की उम्र पार कर चुके थे या बूढ़े हो रहे थे, लेकिन कुंवारे थे। अभी भी वर्त्तमान में लगभग 105 लोगों का शादी अबतक नहीं हो पाया है। गांव की हर घर में लोग अविवाहित रह गए है। कुछ लोगों का उम्र अब तो 60 साल हो चूका है।
शादी न हो पाने का मुख्य कारण :
बुनियादी सुविधाओं का अभाव : यह गांव आधुनिक दुनिया से पूरी तरह काट चूका था। यहाँ न तो पक्की सड़के है न बिजली, न पानी की सही व्यवस्था और न ही बीएसएनएल के अलावे कोई मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट का हाल यह है की 15 मिनट में एक बार पेज खुलता है।
वधु पक्ष का इंकार : गांव की इस बदहाली और कठिन रास्तों { जहाँ गाड़ियों का जाना नामुमकिन था और अभी भी है} को देखकर कोई भी पिता या परिवार वाले अपनी बेटी की शादी इस गांव के लड़कों से करने को तैयार नहीं होते थे और अभी भी यही हाल है। यहाँ न तो शौचालय है और न ही पीने की पानी की व्यवस्था साथ ही दुर्गम पथरीली रास्ते तो बताये भला कौन चाहेगा यहाँ अपनी बेटी की शादी करना।
अब सोचिये की 2005 से बिहार में सुशान बाबू यानि नितीश कुमार ने कमान संभाली फिर भी इस गांव की हालत में कुछ सुधार नहीं हो पाया हुआ तो सिर्फ यह की बिजली की पोल तो लगी लेकिन लाइन कभी भी नहीं आया। यहाँ को लोगों का कहना है की आज़ादी के 79 साल हो गया है फिर भी लगता है की अभी भी अभी भी लोग आदिम जीवन जी रहे है। नितीश कुमार की महत्वाकांक्षी योजना हर घर नल जल के तहत एक टंकी भी लगा है लेकिन भी गांव की महिलाये पाने भरने के लिए गांव के किनारे एक कुँए से गन्दी पानी भर कर घर सभी काम करती है यहाँ पानी के गन्दगी के कारण लोगों को हमेशा बिमारियों ने घेर रखा है। 20 साल पहले शादी हुई फूला देवी का कहना है कि तसली में पानी कपड़ों से छान कर पीने के लिए ले जाते है। फूला देवी ने कहा कि यहाँ के लड़के लड़की की शादी नहीं हो पा रही है क्योंकि न तो यहाँ शौच के लिए घरों में व्यवस्था है और नहीं ही इलाज की व्यवस्था, रास्ता इतना ख़राब है की कई बार इलाज सही समय पर मिल नहीं पता है। गांव तक कनेक्टिविटी भी नहीं है और न ही गांव के अंदर की गलियां पक्की है। कच्ची और दलदली मिटटी वाली गलियों से होकर लोगो का आवाजाही होता है। गांव की अधिकांश घर मिटटी के ही है।
जब सरकार और प्रशासन ने वन्यजीव अभ्यारण्य {Wildlife Sanctuary} के नियमों और अन्य कारणों का हवाला देकर सड़क बनाने से मना कर दिया तो गांव के युवाओं और ग्रामीणों ने खुद कमान संभाली। साल 2008 के आसपास गांव के लोगों ने पारम्परिक औजारों {छेनी-हथौड़ी} कि मदद से पहाड़ो और घने जंगलों को काटकर खुद ही 6 किलोमीटर लम्बी कच्ची सड़क बना डाली, ताकि कम से कम मोटरसाइकिल और ट्रैक्टर गांव तक आ सके। ग्रामीणों की इस मेहनत का रंग फरवरी, 2017 में दिखा। 50 साल के लम्बे सूखे के बाद इस गांव में पहली बार शहनाई बजी, जब अजय कुमार यादव नाम के युवक की शादी हुई और वह अपनी दुल्हन नीतू को विदा कराकर इस गांव में लेकर आये। लोग बाराती भी पैदल ही गए थे। सड़क मार्ग से आंशिक रूप से जुड़ने के बाद अब गांव की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है और शादियां भी होने लगी है लेकिन वहां के लोगों का कहना है कि अभी भी अदला बदली शादी के होती है यानी एक ही घर में लड़का और लड़की के शादी होती है।
मैं इस खबर के आपसे अपील करता हूँ कि सरकार अपनी जिम्मेदारियों को देखे और और बिहार के इस गांव की दुर्दशा को ठीक करे अन्यथा यहाँ से भी एक और दसरथ मांझी पैदा लेगा जो सिस्टम को चुनौती देगा।
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