माननीय सदस्यगण, 16 दिसंबर को हम अपने देश के इतिहास में एक निर्णायक क्षण का दो दिवसीय स्मरणोत्सव मना रहे हैं जो कि 26 नवंबर, 1949 को हमारे देश के संविधान को अंगीकृत किए जाने की 75वीं वर्षगांठ है। यह मील का पत्थर हमें न केवल उत्सव मनाने के लिए प्रेरित करता है, बल्कि हमारी यात्रा को गहराई से समझने और आगे बढ़ने का रास्ता तय करने के लिए रूपरेखा भी प्रदान करता है।
यह संविधान विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का आधार रहा है, जो कि संविधान निर्माताओं की गहन बुद्धिमत्ता और हमारी लोकतांत्रिक भावना के लचीलेपन का प्रमाण है।
इस सभा में अगले दो दिनों तक होने वाले हमारे विचार-विमर्श में इस अवसर की गंभीरता परिलक्षित होनी चाहिए। कामना है कि हमारी चर्चा हमारे संसदीय संस्थानों के बीच संबंधों को मजबूती प्रदान करेगी जो 140 करोड़ लोगों की अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को पूरा करते हुए उनकी सेवा करना चाहते हैं।
जब हम 2047 की ओर देख रहे हैं, जब भारत अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी मना रहा है, तो आइए बहस के माध्यम से हम लोग विकसित भारत के अपने दृष्टिकोण पर प्रकाश डालें।
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